स्वामी विवेकानंद के जीवन चार प्रेरक प्रसंग

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स्वामी विवेकानंद के जीवन चार प्रेरक प्रसंग/Swami vivekanad motivational story in hindi

सत्य बोलने का साहस

स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त्त था| बचपन से ही वे मेधावी छात्र थे | हर कोई उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित रहता था | उनके दोस्त उनकी सारी बातें बहुत ध्यान से सुनते थे |

एक दिन कक्षा में वे अपने कुछ दोस्तों को कहानी सुना रहे थे | सभी उनकी बातों में ऐसे डूबे थे कि मास्टर जी कब आ गये पता ही न चला |

उन्होंने पढ़ाना शुरू किया था कि कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी |

उन्होंने तेज आवाज में पूछा, ‘कौन बात कर रहा हैं ?’

कुछ छात्रों ने स्वामी जी और उनके पास बैठे छात्रों की और इशारा कर दिया | मास्टर जी को गुस्सा आ गया | वे छात्रों से पाठ सम्बंधित प्रश्न पूछने लगे | किसी ने भी प्रश्न का सही उत्तर नहीं दिया | फिर मास्टर जी ने विवेकानंद से प्रश्न किया जिसका उन्होंने सही जवाब दे दिया |

उनका सही जवाब सुनकर मास्टरजी को यकीन हो गया कि विवेकानंद पढाई पर ध्यान दे रहे थे | उनके साथ बैठे छात्र ही बात -चीत में लगे हुए थे |

उन्होंने छात्रों को बेंच पर खड़ा कर दिया | विवेकानंद भी उनके साथ बेंच पर खड़े हो गये |

मास्टर जी बोले -“नरेंद्र तुम बैठ जाओ | उन्होंने कहा कि में भी खड़ा रहूँगा, क्योकि में ही था जो, जो इनसे बातें कर रहा था|”

सभी उनकी सच बोलने कि हिम्मत देखकर बहुत प्रभावित हुए | कहने का तात्पर्य यह हैं कि कभी भी सच का साथ नही छोड़ना चाहिये |

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डर का सामना

एक बार स्वामी विवेकानंद बनारस के भ्रमण पर गये | वहां शाम के समय वे देवी माँ के मंदिर में दर्शन के लिए गये , उस मंदिर में बहुत सारे बंदर थे |दर्शन करके जब स्वामी जी जाने लगे तो बन्दर उनके पीछे पड़ गये | स्वामी जी उनसे बचने के लिए तेजी से चलने लगे |वे जितना तेज चलते बंदर उनके ओर निकट पहुँच जाते |

ये देखकर स्वामी जी भयभीत हो गये | वे दौड़ने ही वाले थे कि एक वर्द्ध सन्यासी ने आवाज देकर कहा ,” रुको, भागों मत; उनका सामना करो ” | ये सुनकर स्वामी जी रुक गये और बंदरों की और बढ़ने लगे |

बंदरों ने स्वामी जी को खों -खों कर डराने का प्रयास किया पर स्वामी जी ने उनकी ओर चलना बंद नहीं किया | ये देखकर बन्दर धीरे-धीरे पीछे हटने लगे |

इस छोटी से घटना ने स्वामी जी को एक बड़ी सीख दे गई | जिसक संबोधन स्वामी जी ने अपने बाद के व्याख्यानों में दिया उन्होंने कहा कि,” यदि तुम किसी चीज से भयभीत हो तो डरों मत, रुको,पलटो और उसका सामना करो

दोस्तों ये सब हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में भी अनुभव किया होगा | हमारा डरना बहुत बार अकारण ही होता है हम किसी समस्या को जितना कठिन समझते है वो कठिन होती नहीं है हमारे थोड़े से ध्यान देने पर ही वो समस्या अपने आप दूर हो जाती हैं |

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लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना

एक बार स्वामी जी अमेरिका में व्याख्यान देने गये | शाम के समय वे जब टहल रहे थे तो टहलते – टहलते वे एक नदी के  किनारे पहुचे जहाँ कुछ बच्चे नदी में तैरते अंडो के छिलकों पर बंदूक से निशाना लगा रहे थे |

स्वामी जी खड़े होकर उन्हें देखने लगे उन्होंने देखा कि किसी भी बच्चे का निशाना अंडो के छिलकों पर नहीं लग रहा हैं , तब उन्होंने बंदूक उन बच्चों से ली और बहते अंडो के छिलकों पर एक -एक करके 12 निशाने लगाये जो सभी सही लगे | ये देखकर सभी बच्चे आश्चर्य चकित रह गये | बच्चों ने पूछा आप ने ये सब कैसे किया |

तब स्वामी जी ने कहा,” निशाना लगाते हुए अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर केन्द्रित करो तब तुम कभी नहीं चूकोगे और तुम्हारा निशाना एक दम सही लगेगा”| अगर यही सीख तुम अपने जीवन में अपना लोगे तो जीवन के हर क्षेत्र में सफल रहोगे |

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व्यापारी की भूल

विवेकानंद जी को एक बार एक धनी व्यापारी ने अपने यहाँ भोजन पर आमंत्रित किया | विवेकानंद जी के पहुंचने पर व्यापारी ने उनका स्वागत किया |भोजनादि से निवृत्त होने के बाद, वे व्यापारी कि बैठक में बैठ गए|

तब उन दोनों के बीच जीवन -धर्म-दर्शन पर चर्चा होने लगी | व्यापारी ईश्वर को नहीं मानता था | इसलिए चर्चा के दौरान उसने प्रश्न उठाया कि – “मूर्ति पूजा क्यों की जाती हैं? एक बेजान मूर्ति किसी को आखिर क्या दे सकती हैं | मुझे इन सब बातों में यकीन नही है|”

विवेकानंद जी ने अपनी नजर बैठक की दीवारों पर डाली तो सामने की दीवार पर एक फोटो टंगा हुआ था और उस पर फूलों की माला डली हुई थी |

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विवेकानंद जी उठकर उस फोटो के पास गये और बोले -” ये तस्वीर किसकी हैं ?”

व्यापारी ने जवाब-” दिया ये मेरे पूज्य पिता जी की हैं कुछ साल पहले इनका निधन हो गया था “|

विवेकानंद जी उस तस्वीर को दीवार से उतरा और उसे व्यापारी के हाथ में देते हुए बोले-” अब इस तस्वीर पर थूकों और नीचे पटक दो “

यह सुनकर व्यापारी सन्न रहा गया वह गुस्से से बोला -” आप ये कैसे कह सकते हो, ये मेरे पूज्य पिताजी की फोटो हैं”|

इस पर विवेकानंद जी ने कहा कि -” इन्हें गुजरे हुए तो एक अरसा हो गया हैं अब तो ये एक बेजान फोटो हैं , इसमें न तो जान हैं और न ही इसमें आवाज हैं , फिर भी आप इसका अनादर नहीं कर सकते हो क्योकि आप इसमें अपने पिता का स्वरूप देखते हो “|

इसी प्रकार मूर्ति पूजा करने वाले मूर्ति में भगवान का स्वरूप देखते हैं | हम जानते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं वह कण -कण में समाया हुआ हैं |मन को एकाग्र करने के लिए ही लोग मूर्ति पूजा करते हैं |

यह सुनकर व्यापारी को अपनी भूल का अहसास हो गया और वह विवेकानंद जी के चरणों में गिरकर माफ़ी मागने लगा |

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