सुश्रुत: विश्व के प्रथम प्लास्टिक सर्जन Biography of sushruta in hindi

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 Biography of sushruta in hindi
Biography of sushruta in hindi

 Biography of sushruta in hindi सुश्रुत : विश्व के प्रथम प्लास्टिक सर्जन

 Biography of sushruta in hindi.शल्य का शाब्दिक अर्थ हैं शरीर की पीड़ा । शरीर की पीड़ा का निवारण ही शल्य चिकित्सा कहलाती है। जिसे आज के समय में हम आप्रेशन या सर्जरी के नाम से जानते हैं । हमें यह भ्रम है कि इस शल्य चिकित्सा कि शुरुवात यूरोपीय देशों से हुई हैं। जबकि भारत में शल्य चिकिसा द्वारा उपचार वर्षो से किया जाता रहा हैं। 

वैसे तो शल्य चिकित्सा द्वारा उपचार आदि काल से ही  भारत में किया जा रहा था। जो धीरे -धीरे विकसित हो रही थी।   यह चिकित्सा बहुत ही पीड़ा दायक होती थी जिसमें अक्सर पीड़ित व्यक्ति कि मृत्यु हो जाया करती थी। 

शल्य चिकित्सा के पूर्व ज्ञान को संग्रहित कर उसे परिस्कृत कर और उसमे नवीन अन्वेषण कर उसमे एक नया अध्याय जोड़ा सुश्रुत ने और वे ही शल्य चिकित्सा के प्रथम  चिकित्सक कहलाये । उन्होंने शल्य चिकिसा के क्षेत्र में इतना अधिक कार्य किया कि जितना उनके पूर्व में और न ही बाद में किसी शल्य चिकित्सक द्वारा किया गया। 

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ऐसा माना जाता हैं कि इनका जन्म 6 शताब्दी ई0 पू0 में काशी में हुआ था और ये महर्षि विश्वामित्र के वंशज थे। सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता की रचना की, उसमें उन्होंने शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तार से बताया। क्योकिं शल्य चिकित्सा एक जटिल विषय है अत : इन्होनें अपने अनवेषण और अनुसन्धान से लगभग 125 शल्य चिकित्सा में उपयोग लाये जाने वाले उपकरणों का निर्माण किया। 

सुश्रुत ने 300 प्रकार की आपरेशन की विधियों की खोज की। इन्होनें नेत्र शल्य चिकित्सा, शल्य चिकित्सा द्वारा प्रसव कराना,टूटी हुई हड्डियों को जोडनें तथा आज के समय में हम जिसे प्लास्टिक सर्जरी के नाम से जानते हैं उसमे उन्हें विशेष महारत हासिल थी। इस शल्य चिकित्सा में वे नाक,कान, होठ, व चेहरे की सुन्दरता बढ़ाने के लिए उस स्थान से मांस हटा देते थे या शरीर के अन्य स्थान से उस हिस्से पर मांस लगाकर उसे सुन्दर रूप प्रदान कर देते थे। इसके अतिरिक्त उन्हें मधुमेह व मोटापे की भी विशेष जानकारी थी। 

शल्य चिकित्सा के दौरान वे दर्द कम करने के लिए मधपान व अनेक प्रकार की औषिधियाँ देते थे। सुश्रुत संहिता में उन्होंने 650 प्रकार की दवाइयों का भी वर्णन किया है। 

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सुश्रुत जितने अच्छे शल्य चिकित्सक थे उतने ही अच्छे शिक्षक भी थे। वे अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा का अभ्यास पहले फलों  व सब्जियों पर फिर पशुओं के मृत शरीरों पर और बाद में मनुष्यों के मृत शरीरों पर कराते थे । उनका ये मानना था कि चिकित्सक को पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा प्रयोगात्मक ज्ञान में प्रवीन होना चाहिये। 

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सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा के अतिरिक्त आयुर्वेद की विभिन्न विधाओं पर भी काफी कार्य किया जैसे – शरीर रचना, का्य चिकित्सा, बाल रोग ,स्त्री रोग ,मनोरोग आदि। उन्होंने इन सभी विधाओं की शिक्षा भी अपने छात्रों को दी। 

सुश्रुत संहिता का अनुवाद अरबी एवं यूनानी के अलावा विश्व की अनेक भाषाओ में हो चुका है और दुनियां के अनेक देशों ने भी सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का प्रथम गुरु माना हैं | विश्व के सभी देशों के चिकित्सकों के बीच उनका नाम बहुत सम्मान के साथ आज भी याद किया जाता हैं। 

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