Shri Govind Ranade ( श्री गोविन्द रानाडे )

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श्री गोविन्द रानाडे

यह घटना मुंबई की हैं।  एक वृद्ध महिला लकड़ियों का एक गटठर सर पर उठवाने के लिए रस्ते चलते लोगों से मदद मांग रही थी।  परंतु कोई भी उसकी मदद करने के लिए सामने नहीं आया तो वह परेशान होकर बैठ गई।

तभी एक कोट -पेंट  व टाई  पहने एक सज्जन आता दिखाई पड़ा।  वृद्ध महिला चाहकर भी उसे मदद के लिए नहीं पुकार सकी। उन सज्जन को लगा कि शायद वह महिला उनसे कुछ कहना चाहती हैं तो उन्होंने उससे रुककर पूछा – ” माँ ! क्या कहना चाहती हो ? “

यह आत्मीय संबोधन सुनकर वृद्ध महिला की आँखों में आंसू आ गए और बोली -” में यहाँ से गुजरने वाले हर व्यक्ति से गटठर रखवाने को मदद माँग रही थीं। पर कोई भी मेरी मदद को नही आया। “

उन सज्जन ने तुरंत वह गटठर उठा कर उनकी सर पर रख दिया। वह सज्जन और कोई नहीँ -मुंबई न्यायलय के न्यायधीश श्री गोविन्द रानाडे जी थे।

  इसलिए Dosto व्यक्ति अपने पद से नहीं बल्कि सद्गुणों से महान बनता हैं। हमारे सद्गुण ही जो  हमें एक साधारण व्यक्ति से उठाकर हमें महान लोंगो की श्रेणी में खड़ा करते हैं। 

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