शिवाजी महाराज के जीवन के प्रेरणादायक प्रसंग

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 प्रसंग – 1

शिवाजी महाराज के पिता का नाम शाह जी  और माता का नाम जीजाबाई था. पिता शाहजी बीजापुर दरबार के कृपापात्र दरबारी थे .

शाहजी चाहते थे कि उनका पुत्र बीजापुर दरबार का सेवक बने .जब शिवाजी आठ वर्ष के थे उनके पिता उन्हें दरबार दिखाने ले गए .उन्होंने सोचा शिवा दरबार की शान शौकत से प्रभावित हो जायेगा पर बालक शिवा पर माता जीजाबाई दुवारा बचपन से रामायण ,महाभारत ,और पुराणों की सुनाई गई वीर गाथाओं का प्रभाव था .

बालक शिवा बिना किसी से प्रभावित हुए पिता के साथ ऐसे चलते गए जैसे साधारण मार्ग पर जा रहे हो .

नवाब के सामने पहुचकर पिता ने नवाब का झुककर अभिवादन किया और शिवा को कहाँ – ‘ बेटा ! बादशाह को सलाम करो .’

बालक ने पिता की और देखा और खा बोला – ‘ बादशाह मेरे राजा नहीं हैं . मैं इनके सामने सिर नहीं झुका सकता .’

दरबार में सनसनी फ़ैल गई . नवाब बालक की ओर घूरकर देखने लगा ; किन्तु शिवा ने सिर नहीं झुकाया .

शाहजी ने नवाब से प्रार्थना की – ‘ शाहंशाह ! क्षमा करें’.

यह अभी नादान हैं और बालक को लेकर घर आ गए .घर आने पर शाहजी ने शिवा को डाटा , तब शिवा ने उत्तर दिया-‘  मेरा मस्तक केवल तुलजा भवानी और आपको छोड़कर किसी की सामने नहीं झुक सकता ‘.

 प्रसंग – 2

ये घटना उस समय की हैं जब शिवाजी 12 वर्ष के थे . एक दिन वे बीजापुर के मुख्य मार्ग पर घूम रहे थे . उन्होंने देखा कि एक कसाई एक गाय को रस्सी से बाधें ले जा रहा हैं . गाय आगे नहीं जाना चाहती थी . वह दकराती हुई इधर -उधर कातर नेत्रों से देख रही थी .कसाई उसे डंडे से बार -बार पीट रहा था .

उस मुसलमानी राज्य में किसी में इतना साहस नहीं था कि उस गाय की सहायता कर सकें. तभी लोगों ने देखा कि बालक शिवा ने अपनी तलवार निकाली और गाय कि रस्सी काट दी . गाय भाग गई .

कसाई ने बालक पर हमला किया पर शिवा ने बिजली की रफ़्तार से अपनी तलवार उसके सीने में घुसा दी .

 प्रसंग – 3

               शिवाजी महाराज की सेना ने युद्ध में एक किला जीता . किले का मुग़ल किलेदार युद्ध में मारा गया. किलेदार की पुत्री बहुत ही सुन्दर थी . मराठा सूबेदार ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर उसे शिवाजी महराज की सामने पेश करने की ठानी .वह उसे शिवाजी महराज के पास ले गया .

शिवाजी महराज ने जब उस युवती को देखा तो उसकी तारीफ किये बिना न रह सके लेकिन उन्होंने उसकी तारीफ कुछ इस प्रकार की ” काश ! हमारी माता भी इतनी सुन्दर होती तो में भी सुन्दर होता .” 

इसके बाद शिवाजी ने अपने सेनापति को डांटते हुए कहा कि इस युवती को ससम्मान जल्द से जल्द उसके घर छोड़ आएं. उन्होंने अपने सेनापतियों को स्पस्ट निर्देश दिए युद्ध किसी भी महिला का अपमान न होने पाए. उनके साथ माँ और बहन की तरह से पेश आये.

वीर शिवाजी जितने बहादुर थे उतना ही उनका चरित्र द्रढ़ था . उन्होंने जीवन पर्यन्त अपनी माँ द्वारा दी गई शिक्षाओं का पालन किया .

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