पुस्तकीय ज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी आवश्यक है |

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पुस्तकीय ज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी आवश्यक है

एक बार खलीफा हारून -अल -रशीद बगदाद शहर का निरीक्षण करने निकले | रास्ते में उन्हें एक भव्य इमारत दिखाई दी जिस पर ‘ मदरसा अब्बसिया ‘ का बोर्ड लिखा था |

खलीफा ने अपने मंत्री से पूछा , ‘हमारे शहजादे अमीन और मामून इसी मदरसे में शिक्षा पाते हैं न ? मंत्री ने कहा, जी हाँ हुजूर!

खलीफा घोड़े से उतरे और मदरसे में प्रवेश किया | उन्हें सफेद दाढ़ी वाला एक बुजुर्ग हाथ धोता हुआ दिखाई दिया | वह उस मदरसे का उस्ताद था | हाथ-मुहँ धोने के बाद उसने बादशाह को सलाम किया |

खलीफा बोले -‘ हम आपके मदरसे का मुआयना करने आये है,लेकिन हमें यह देखकर बड़ा अफ़सोस हुआ कि यहाँ पूरी शिक्षा नहीं दी जाती हैं |’

उस्ताद डरते हुए बोला,’ गुस्ताखी माफ़ हो हुजूर, मुझसे क्या गलती हो गई ?’

खलीफा ने कहा जब आप हाथ धो रहे थे ,तब हमारे शहजादे चुपचाप खड़े थे |उस्ताद की जगह बहुत ऊँची होती हैं और उस्ताद की खिदमत करना हर शिष्य का फर्ज होता है | लेकिन हमने देखा कि शहजादे चुचाप खड़े थे | उनको चाहिए थे कि वे आपको पानी लाकर देते व् आपके पैरों पर डालते | मालुम होता हैं की आपने उनको यह शिक्षा नहीं दी हैं ?’

यह सुनकर उस्ताद हैरान रह गए और शहजादे अमीन और मामून शर्म से शिर झुकाये खड़े थे |

एक  अच्छे शिक्षक को अपने विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं बल्कि उन्ही व्यवहारिक ज्ञान भी देना चाहिए यथा -शिष्टाचार,सदाचार,बड़ों व् शिक्षकों का उचित सम्मान, प्रेम , सहयोग आदि के मानवीय मूल्य व् सद्गुणों के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए |

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