मिर्जा ग़ालिब की शायरी| Mirza Galib ki shayari

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Mirza Galib ki shayari

मिर्जा ग़ालिब की शायरी| Mirza Galib ki shayari

(1)

साँस भी बेवफा

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

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(2)

बाद मरने के

चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत .
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला

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(3)

 इश्क़

बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है

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(4)

सारी उम्र

तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे

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(5)

जन्नत की हकीकत

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को “ग़ालिब” यह ख्याल अच्छा है

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(6)

जिस काफिर पे दम निकले

मोहब्बत मैं नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते है जिस काफिर पे दम निकले

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(7)

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

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(8)

इंतिज़ार

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार* होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

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(9)

पत्थर नहीं हूँ मैं

दाइम* पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

* दाइम  =  अन्नत

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(10)

वफ़ा

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

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(11)

तमाशा-ए-अहल-ए-करम

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ‘ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

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(12)

अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

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(13)

उम्मीद पे जीते हैं लोग

कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग.
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं.

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(14)

मोहब्बत

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता कि दुआ क्या हैं

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(15)

चेहरे पर रौनक

उन को देखने से आ जाती है चेहरे पर जो रौनक
वो समझते है कि बीमार का हाल अच्छा है

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(16)

हाल-ए-दिल

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

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(17)

खुदा कहां नहीं

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता दे जहां खुदा नहीं ..!!

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(18)

सादगी

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

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(19)

असली चेहरे

रहने दे मुझे इन अंधेरों में ग़ालिब.
कमबख्त रौशनी में अपनों के असली चेहरे सामने आ जाते हैं ..!!

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(20)

बुरा वक्त

ऐ बुरे वक्त, जरा अदब से पेश आ.
क्योकिं वक्त नहीं लगता वक्त बदलने में.!

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