Govardhan puja mahatva katha muhurat vidhi in hindi| गोवर्धन पूजा महत्व , विधि और मुहूर्त व् कथा|

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Govardhan puja mahatva, katha, muhurat, vidhi in hindi|गोवर्धन पूजा महत्व , विधि और महूर्त व् कथा|

दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja) की जाती है । इसके लिए घर के मुख्य द्वार पर गौ के गोबर से गोवर्धन जी बनाये जाते है ।तत्पश्चात ब्रज के साक्षात देवता माने जाने वाले गोवर्धन पर्वत को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।गोवर्धन पूजा में  गोर्वधन की पूजा की जाती है और वर्तमान समय में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतिकृति बनाकर पूजा की जाती हैं ।

govardhan puja vidhi in hindi

 

गोवर्धन पूजा का महत्व | Importance of Govardhan Puja 

गोवर्धन पूजा हमें यह सन्देश देती हैं कि हमें प्रकृति से जो कुछ भी मिलता हैं हमें उसका धन्यवाद देना चाहिए।  वर्तमान में इसीलिए गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ माता सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है।

गोवर्धन पूजा 2017 शुभ मुहूर्त

गोवर्धन पूजा पर्व तिथि – 20 अक्तूबर 2017, शुक्रवार

गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त – प्रातः 06:28 बजे से 08:43 बजे तक

गोवर्धन पूजा सायं काल मुहूर्त – दोपहर बाद 03:27 बजे से सायं 05:42 बजे तक

प्रतिपदा तिथि प्रारंभ – रात्रि 00:41 बजे से (20 अक्तूबर 2017)

प्रतिपदा तिथि समाप्त – रात्रि 1:37 बजे तक (21 अक्तूबर 2017)

Govardhan Puja Samagri in Hindi | गोवर्धन (अन्न कूट) पूजा सामग्री

i) गाय का गोबर – गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने के लिए ।

ii) लक्ष्मी पूजन वाली थाली , बड़ा दीपक , कलश व बची हुई सामग्री काम में लेना शुभ मानते है। लक्ष्मी पूजन में 2 साबुत गन्ने  रखने चाहिए।

iii) रोली , मौली , अक्षत,फूल माला , पुष्प,बिना उबला हुआ दूध,2 गन्ने, बताशे, चावल, मिट्टी का दीया,जलाने के लिए धूप , दीपक ,अगरबत्ती,नैवेद्य के रूप में फल , मिठाई आदि अर्पित करें, पंचामृत के लिए दूध, दही, शहद, घी और शक्कर,भगवान कृष्ण की प्रतिमा

 

Govardhan Puja Vidhi in Hindi | गोवर्धन (अन्न कूट) सम्पूर्ण एवं सरल पूजन विधि

इस दिन प्रात:काल शरीर पर तेल की मालिश के बाद स्नान करना का प्रावधान हैं । उसके बाद पूजन सामग्री के साथ पूजा स्थान पर बैठें और अपने कुलदेव का ध्यान करें पूजा के लिए गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनायें। इसे लेटे हुए पुरुष की आकृति में बनाया जाता है । फूल , पत्तियों , टहनियों व गाय की आकृतियों से या अपनी सुविधानुसार उस आकृति को सजायें । और उनके मध्य में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति रखे । नाभि के स्थान पर एक कटोरी जितना गड्डा बना लें और वहाँ एक कटोरी या मिट्टी का दीपक रखे फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे आदि पूजा करते समय डाल दिए जाते हैं और बाद में इसे प्रसाद के रूप में बांट देते हैं।

अब इस मंत्र को पढ़ें

गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक।
विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव।।

इसके बाद गायों को स्नान कराएं और उन्हें सिन्दूर आदि से सजाएं। उनकी सींग में घी लगाएं और गुड़ खिलाएं। फिर इस मंत्र का उच्चारण करें।

लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुरूपेण संस्थिता।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।।

नैवेद्य के रूप में फल , मिठाई आदि अर्पित करें। गन्ना चढायें। एक कटोरी दही नाभि स्थान में डाल कर बिलोने से झेरते है और गोवर्धन के गीत गाते हुए गोवर्धन की सात बार परिक्रमा करते हैं । परिक्रमा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा व अन्य खील (जौ) लेकर चलते हैं। जल के लोटे वाला व्यक्ति पानी की धार गिराता हुआ परिक्रमा लगाता हैं तथा अन्य जौ बोते हुए परिक्रमा पूरी करते हैं।

गोवर्धन पूजा कथा | Govardhan Puja Katha

गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक लोक कथा प्रचलित है। कथा यह है कि देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था। इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची। प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे।

श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया “ मईया ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं” कृष्ण की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं। मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? मैईया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है। भगवान श्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए।

लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है। तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया। इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी। इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें।

इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया। ब्रह्मा जी ने इन्द्र से कहा कि आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं। ब्रह्मा जी के मुंख से यह सुनकर इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा। आप दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल क्षमा करें। इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया।

इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।

 

श्री गोवर्धन महाराज की आरती |  Govardhan Maharaj Aarti

श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।

तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़,
तोपे चढ़े दूध की धार।

तेरी सात कोस की परिक्रम्मा,
चकलेश्वर है विश्राम।

तेरे गले में कंठा साज रेहेओ,
ठोड़ी पे हीरा लाल।

तेरे कानन कुंडल चमक रहेओ,
तेरी झांकी बनी विशाल।

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