वीर गोकुला जाट के जिसने मुग़ल सल्तनत की चूल हिला दी थी, 348 शहीद दिवस पर इस वीर को शत-शत नमन

0
148 views

वीर गोकुला जाट के जिसने मुग़ल सल्तनत की चूल हिला दी थी, 348 शहीद दिवस पर इस वीर को शत-शत नमन

सन 1666 का समय था और राक्षस औरंगजेब के अत्याचारोँ से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरोँ को तोङा जा रहा था, हिँदू स्त्रियोँ की ईज्जत लूटकर उन्हेँ मुसलमानी बना दिया जाता था। औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह जनता को मथते हुए बढते जा रहे थे।

औरंगजेब अपने ही जैसे क्रूर लोगोँ को अपनी सेना मेँ उच्च पद देकर हिँदुस्तान को दारुल हरब से दारुल इस्लाम मेँ तब्दील करने के अपने सपने की तरफ तेजी से बढता जा रहा था। हिँदुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया.

अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला। सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया, मुग़ल सैनिकों ने लूटमार से लेकर किसानों के ढोर-डंगर तक खोलने शुरू कर दिए और संघर्ष शुरू हो गयाl तभी औरंगजेब का मुगलिया शैतानी फरमान आया – “काफ़िरों के मन्दिर गिरा दिए जाएं”। फलत: ब्रज क्षेत्र के कई अति प्राचीन मंदिरों और मठों का विनाश कर दिया गयाl कुषाण और गुप्त कालीन निधि, इतिहास की अमूल्य धरोहरोँ को तहस-नहस कर दिया गया।

अब्दुन्नवी और उसके सैनिक हिँदू वेश मेँ नगर मेँ घूमते थे और मौका पाकर औरतोँ का अपहरण करके भाग जाते थे। अब जुल्म की इंतेहा हो चुकी थी। तभी दिल्ली के सिँहासन के नाक तले समरवीर जाट योद्धा गोकुला जाट और उसकी किसान सेना ने आततायी औरंगजेब को जाटो की ताकत का अहसास दिलाया।

मई 1669 मेँ अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया और उस समय वीर गोकुला गाँव मेँ ही था। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर जाटोँ के सामने टिक ना पाई और सारे गाजर-मूली की तरह काट दिए गए, मुगलोँ की सदाबद छावनी जला दी गई। उस अत्याचारी अब्दुन्नवी की चीखेँ दिल्ली की आततायी सल्तनत को भी सुनाई दी थी। मुगलोँ की जलती छावनी के धुँए ने औरंगजेब को अंदर तक हिलाकर रख दिया। औरंगजेब इसलिए भी डर गया था क्योँकि गोकुला की सेना मेँ जाटोँ के साथ कुछ गुर्जर, अहीर, ठाकुर, मेव मुसलमान इत्यादि भी थे

इस विजय ने मृतप्राय लोगो मेँ नए प्राण फूँक दिए। औरंगजेब ने सैफ शिकन खाँ को मथुरा का नया फौजदार नियुक्त किया और उसके साथ रदांदाज खान को गोकुल का सामना करने के लिए भेजा। लेकिन असफल रहने पर औरंगजेब ने महावीर गोकुला को संधि प्रस्ताव भेजा।

गोकुला ने औरंगजेब का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योँकि औरंगजेब कोई सत्ता या जागीरदारी के लिए नहीँ बल्कि धर्मरक्षा के लिए लङ रहा था और औरंगजेब के साथ संधि करने के बाद ये कार्य असंभव था। गोकुल ने औरंगजेब का उपहास उङाते हुए कहा कि “अपनी लङकी दे जाओ हम तुम्हेँ माफ कर देँगे।” अब औरंगजेब दिल्ली से चलकर खुद आया गोकुल से लङने के लिए।

औरंगजेब ने मथुरा मेँ अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति हसन अली खान को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ मुरसान भेजा। ग्रामीण रबी की बुवाई मेँ लगे थे तो हसन अली खाँ ने ने गोकुला की सेना की तीन गढियोँ/गाँवोँ रेवाङा, चंद्ररख और सरकरु पर सुबह के वक्त अचानक धावा बोला। औरंगजेब की शाही तोपोँ के सामने किसान योद्धा अपने मामूली हथियारोँ के सहारे ज्यादा देर तक टिक ना पाए और जाटोँ की पराजय हुई।

इस जीत से उत्साहित औरंगजेब ने अब सीधा गोकुला से टकराने का फैसला किया। औरंगजेब के साथ उसके कई फौजदार और उसके गुलाम कुछ हिँदू राजा भी थे। वीर गोकुला के विरुद्ध औरंगजेब का ये अभियान शिवाजी जैसे महान राजाओँ के विरुद्ध छेङे गए अभियान से भी विशाल था। औरंगजेब की तोपोँ, धर्नुधरोँ, हाथियोँ से सुसज्जित विशाल सेना और गोकुला की किसानोँ की 20000 हजार की सेना मेँ vतिलपत का भयंकर युद्ध छिङ गया।

4 दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारोँ के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारोँ से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पङ रही थी। इस लङाई मेँ सिर्फ पुरुषोँ ने ही नहीँ बल्कि उनकी चौधरानियोँ ने भी पराक्रम दिखाया था।

मनूची नामक यूरोपिय इतिहासकार ने जाटोँ और उनकी चौधरानियोँ के पराक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “अपनी सुरक्षा के लिए ग्रामीण कंटीले झाडियों में छिप जाते या अपनी कमजोर गढ़ियों में शरण लेते, स्त्रियां भाले और तीर लेकर अपने पतियों के पीछे खड़ी हो जातीं। जब पति अपने बंदूक को दाग चुका होता, पत्नी उसके हाथ में भाला थमा देती और स्वयं बंदूक को भरने लगती थी । इस प्रकार वे उस समय तक रक्षा करते थे,जब तक कि वे युद्ध जारी रखने में बिल्कुल असमर्थ नहीं हो जाते थे ।

जब वे बिल्कुल ही लाचार हो जाते, तो अपनी पत्नियों और पुत्रियों को गरदनें काटने के बाद भूखे शेरों की तरह शत्रु की पंक्तियों पर टूट पड़ते थे और अपनी निश्शंक वीरता के बल पर अनेक बार युद्ध जीतने में सफल होते थे”। मुगल सेना इतने अत्याधुनिक हथियारोँ, तोपखाने और विशाल प्रशिक्षित संख्या बल के बावजूद जाटोँ से पार पाने मेँ असफल हो रही थी। 4 दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व मेँ 1 नई विशाल मुगलिया टुकङी आ गई और इस टुकङी के आते ही गोकुला की सेना हारने लगी।

तिलपत की गढी की दीवारेँ भी शाही तोपोँ के वारोँ को और अधिक देर तक सह ना पाई और भरभराकर गिरने लगी। युद्ध मेँ अपनी सेना को हारता देख जाटोँ की औरतोँ, बहनोँ और बच्चियोँ ने भी अपने प्राण त्यागने शुरु कर दिए। हजारोँ नारियोँ जौहर की पवित्र अग्नि मेँ खाक हो गई।

तिलपत के पत्तन के बाद गोकुला और उनके ताऊ उदय सिँह को साथियोँ सहित बंदी बना लिया गया। इन सभी को आगरा लाया गया। लोहे की बेङियोँ मेँ जसभी बंदियोँ को औरंगजेब के सामने पेश किया गया तो औरंगजेब ने कहा “जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत?”

अधिसंख्य धर्म-परायण जाटों ने एक सुर में कहा – “बादशाह, अगर तेरे खुदा और रसूल का का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना l”

गोकुल की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला तो हजारोँ चीत्कारोँ ने एक साथ आसमान को कोलाहल से कंपा दिया। बरछे से कटकर चबूतरे पर गिरकर फङकती हुई गोकुला की भुजा चीख-चीखकर अपने मेँ समाए हुए असीम पुरुषार्थ और बल की गवाही दे रही थी। लोग जहाँ इस अमानवीयता पर काँप उठे थे वहीँ गोकुला का निडर और ओजपूर्ण चेहरा उनको हिँदुत्व की शक्ति का एहसास दिला रहा था। गोकुला ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बङे ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा कि दूसरा वार करो। दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खङी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुला के शरीर के एक-एक जोङ काटे गए। गोकुला का सिर जब कटकर धरती माता की गोद मेँ गिरा तो मथुरा मेँ  केशवराय जी का मंदिर भी भरभराकर गिर गया। यही हाल उदय सिँह और बाकी बंदियोँ का भी किया गया।

इतिहासकारोँ ने लिखा है कि इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश, इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद, उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके, बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व व अतुलनीय है

इतिहासकारोँ ने लिखा है कि भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो, हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था, पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थे, परन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला l

गोकुल सिर्फ़ जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे न उनका राज्य ही किसी ने छीना लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुग़ल-सत्ता, दीनतापुर्वक, सन्धि करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी । शर्म आती है कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कागज के ऊपर भी सम्मान नहीं दे सके । कितना अहसान फ़रामोश कितना कृतघ्न्न है हमारा हिंदू समाज !

साभार – Jatt community

————————————————-

दोस्तों यदि आपके पास वीर गोकुला जाट के जिसने मुग़ल सल्तनत की चूल हिला दी थी, 348 शहीद दिवस पर इस वीर को शत-शत नमन में ओर जानकारी हैं, या हमारे द्वारा दी गई जानकारी में कुछ त्रुटी लगे या कोई सुझाव हो तो comment करके सुझाव हमें अवश्य दें । हम इस पोस्ट को update करते रहेंगें ।दोस्तों यदि आपको हमारी पोस्ट अच्छी लगी हो तो उसे like और share अवश्य करें 

धन्यवाद 🙂

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here