भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के जीवन का प्रेरक प्रसंग

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उस छोटे से बालक को रोज नए- नए खेल खेलने में बड़ा आनंद आता। एक दिन उसके पिता ने उसे एक छोटी सी कुल्हाड़ी लाकर दी।

बालक नया खिलौना पाकर खुशी से झूम उठा। अब वह दिन-रात कुल्हाड़ी से ही खेलता। एक दिन जब उसके पिता बाहर गए हुए थे | उसने  खेल-खेल में कुल्हाड़ी से आम का एक पेड़ काट डाला।

शाम को जब पिता घर लौटे तो उन्होंने आम के पेड़ को कटा हुआ देखा, वे  गुस्से से आग-बबूला हो गए। उन्होंने बालक से पूछा, ‘यह आम का पेड़ किसने काटा है।’

बालक सोचने लगा कि यदि वह सच बोलता है तो सजा अवश्य मिलेगी, लेकिन झूठ बोलने पर बचा जा सकता है। फिर बालक के मन ने कहा कि झूठ बोलने से सजा तो नहीं होगी किंतु झूठ बोलना भी तो गलत ही है। एक गलती को छिपाने के लिए दूसरी गलती करना अपराध ही है। यह सोच कर बालक बोला, ‘मैंने इस पेड़ को काटा है।’

बालक की बात सुनकर पिता के चेहरे पर प्रसन्नता झलक उठी। वह यह जान चुके थे कि पेड़ उनके पुत्र ने ही काटा है किंतु उन्होंने पुत्र की ईमानदारी परखने के लिए ही उससे यह बात पूछी थी।

इसके बाद वह बोले, ‘बेटा, तुमने सच बोलकर मेरा मन जीत लिया। मुझे लग रहा था कि तुम कहोगे कि पेड़ मैंने नहीं काटा है। किंतु तुमने मेरी आशा के विपरीत सच को स्वीकार किया। आज जो तुमने नुकसान किया है, मैं तुम्हें उसके लिए सजा नहीं दूंगा। किंतु यह जरूर कहूंगा कि चाहे कुछ भी हो जाए, जीवन में कभी भी झूठ न बोल

बालक ने प्रण किया कि वह कभी भी झूठ नहीं बोलेगा। यही बालक आगे चलकर सच्चाई व मेहनत के बल पर देश के राष्ट्रपति पद पर विराजमान हुए। वह राष्ट्रपति थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद।

दोस्तों ये प्रेरक प्रसंग कैसा लगा अपने कमेंट द्वारा अवश्य बताये

thanku 🙂

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