बारावफ़ात अथवा ईद-ए-मीलाद या ‘मीलादुन्नबी’ क्यों मनाया जाता हैं |Eid A Milad Un Nabi or Baravafat kyo manaya jata hai

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Eid A Milad Un Nabi or Baravafat kyo manaya jata hai

बारावफ़ात अथवा ईद-ए-मीलाद या ‘मीलादुन्नबी’ क्यों मनाया जाता हैं |Eid A Milad Un Nabi or Baravafat kyo manaya jata hai

बारावफ़ात अथवा ईद-ए-मीलाद या ‘मीलादुन्नबी’ इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार है। जिसे पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के जन्म की खुःशी में मनाया जाता है।ईद-ए-मीलाद यानी ईदों से बड़ी ईद के दिन, तमाम उलेमा और शायर कसीदा-अल-बुरदा शरीफ पढ़ते हैं। अरब के सूफी बूसीरी, जो 13वीं सदी में हुए, उन्हीं की नज्मों को पढ़ा जाता है।

अपनी रुखसत से पहले पैगम्बर, बारा यानी बारह दिन बीमार रहे थे। वफात का मतलब है इंतकाल। इसीलिए पैगम्बर साहब के रुखसत होने के दिन को बारावफात कहते हैं। उन दिनों उलेमा व मजाहबी दानिश्वर तकरीर व तहरीर के द्वारा मुहम्मद साहब के जीवन और उनके आदर्शो पर चलने की सलाह देते हैं।

बारावफात मनाने के शुरुआत(Starting of Baravafat)-

बारावफ़ात को मनाने की शुरुआत मिस्र में 11वीं सदी में हुई। फातिमिद वंश के सुल्तानों ने इसे मनाना शुरू किया। पैग़म्बर के रुख़्सत होने के चार सदियों बाद शियाओं ने इसे त्योहार की शक्ल दी। अरब के सूफ़ी बूसीरी, जो 13वीं सदी में हुए, उन्हीं की नज़्मोंको पढ़ा जाता है। इस दिन की फ़ज़ीलत इसलिए और भी बढ़ जाती है, क्योंकि इसी दिन पैग़म्बर साहब रुख़्सत हुए थे।

ईद-ए-मिलाद कब मनाया जाता है- (Eid-E-Milad Kab Manaya Jata Hai )-

इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक उनका जन्म रबी-उल- अव्वल महीने की 12वीं तारीख को हुआ था। यह संयोग है कि उनकी आमद इस्लामी हिजरी सन के रबी उल महीने की 12 तारीख को हुई थी और उन्होंने 12 तारीख को ही दुनिया से पर्दा लिया था।

ईद-ए-मिलाद को वर्ष 2017 में कब मनाया जायेगा।-

साल 2017 में यह त्यौहार  01 दिसम्बर से 02 दिसम्बर तक मनाया जा रहा है।

मिलाद-उन-नबी को कैसे मनाते हैं-

इस त्यौहार को लेकर दोनों मुस्लिम समुदाय शिया और सुन्नी में ही अलग-अलग मत है। जिस लिए वे इस  त्यौहार को अलग – अलग ढंग से मनाते हैं।

शिया मुसलमानों द्वारा मिलाद उन नबी को मनाने का तरीका-

शिया मुस्लिम समुदाय के लोग इस त्यौहार को इसलिए मनाते है क्योंकि वह मानते हैं कि इसी दिन गाधिर-ए-खुम (Gadhir-E-Khumm) में पैगंबर मुहम्मद ने हज़रत अली को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था। यह अवसर हबिल्लाह को इंगित करता है कहने का मतलब एक चैन सिस्टम की अमामत जिसमें एक नए नेता की शुरूआत होती है। इसके साथ ही शिया समुदाय के लोग इस दिन पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म की खुशी में इसे मनाते हैं।

सुन्नी मुसलमानों द्वारा मुलाद उन नबी मनाने का तरीका-

वहीं सुन्नी मुस्लिम समुदाय को लोग इस दिन उनकी मौत का दिन मानते हैं इस कारण वह पूरे माह शोक मनाते हैं।

इस समुदाय के लोग प्रार्थना मस्जिदों में महीने भर के लिए जाते है। 12 वें दिन सुन्नी मुस्लिम के लोग पवित्र पैगंबर और उनके द्वारा बताये गये सही विचारों और मार्ग को याद करते हैं।

इस दिन होने वाले कार्यक्रम-

मस्जिदों में महीने भर के लिए प्रार्थना की जाती हैं। 12वें दिन सुन्नी मुश्लिम समुदाय के लोग पवित्र पैगंबर और उनके द्वारा दिए गए सही मार्ग और विचारों को याद करते हैं। इस्लाम का सबसे पवित्र ग्रंथ कुरान भी इस दिन पढ़ा जाता है। इसके अलावा लोग मक्का मदीना और दरगाहों पर जाते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन को नियम से निभाने से लोग अल्लाह के और करीब जाते हैं, और उन पर अल्लाह की रहम होती है।

इस दिन वे शोक नहीं मनाते हैं, क्योंकि सुन्नी मुस्लिम यह विश्वास करते हैं कि 3 दिन से ज्यादा शोक मनाने से मृत्यु हुए व्यक्ति की आत्मा को ठेंस पहुँचता है।

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