Chhath puja ka mahtva  katha in hindi| छठ पूजा का महत्व और कथा

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Chhath puja ka mahtva  katha in hindi| छठ पूजा का महत्व और कथा

Chhath puja ka mahtva katha in hindi

पर्वों और त्योहारों के देश भारत में कई तरह के उत्सवों को काफी धूमधाम से मनाया जाता है। साल में कोई ऐसा महीना नहीं होता जिसमें कोई व्रत और पर्व ना हो।एक समय ऐसा था जब छठ केवल बिहार में ही मनाया जाता था, लेकिन आज के समय में यह पर्व बिहार के साथ ही पूर्वी उत्तरप्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी बड़े ही धूमधाम से बनाया जाता है। दिवाली के बाद सूर्य भगवान के उपासना का सबसे बड़ा त्योहार छठ आता है।इस साल चार दिनों तक चलने वाला ये छठ पर्व 24 अक्टूबर से नहाय खाय के साथ शुरू होगा। 25 अक्टूबर को खरना, 26 अक्टूबर को सांझ का अर्ध्य और 27 अक्टूबर को सूर्य को सुबह का अर्ध्य के साथ ये त्योहार संपन्न होगा।

ये पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को ‘चैती छठ’ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को ‘कार्तिकी छठ’ कहा जाता है।  पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए ये पर्व मनाया जाता है।

छठ पूजा का महत्व | Importance of Chhath Puja

भगवान सूर्य वास्तव में एक मात्र ऐसे देव हैं। जिनकी जीवनदायनी रोशनी से ही प्रकृति का जीवन चक्र चलता है। इनकी किरणों से ही धरती में प्राण का संचार होता है और फल, फूल, अनाज, अंड और शुक्र का निर्माण होता है। यही वर्षा का आकर्षण करते हैं और ऋतु चक्र को चलाते हैं।

सूर्य देवता की इस अपार कृपा के लिए श्रद्धा पूर्वक समर्पण और पूजा उनके प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। सूर्य षष्टी या छठ व्रत इन्हीं आदित्य सूर्य भगवान को समर्पित है।

इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी होती है। इस पर्व के विषय में मान्यता यह है कि जो भी षष्टी माता और सूर्य देव से इस दिन मांगा जाता है वह मुराद अवश्य पूरी होती है।

छठ पूजा व्रत कथा | Chhath Puja Vrat Katha in Hindi

छठ पूजा की परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में कई कथाएं प्रचलित हैं। आइये हम आपको परिचय इन लोक कथाओं से कराते हैं ।

1. सूर्य की उपासना से हुई राजा प्रियवंद दंपति को संतान प्राप्ति

 एक प्राचीन कथा के अनुसार प्रियव्रत नामक एक राजा की कोई संतान नहीं थी। एक प्राचीन कथा के अनुसार प्रियव्रत नामक एक राजा की कोई संतान नहीं थी।उसने संतान प्राप्ति के लिए  हर जतन कर कर डाले, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। महर्षि कश्यप ने  राजा को उसे पुत्रयेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के बाद महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह मरा पैदा हुआ। राजा के मृत बच्चे की सूचना से पूरे नगर में शोक छा गया। जब राजा मृत बच्चे को दफनाने की तैयारी कर रहे थे, तभी आसमान से भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं।देवी ने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैंदेवी ने कहा, ‘मैं षष्ठी देवी और विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं।’ इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर को स्पर्श किया, जिससे वह जीवित हो उठा। इसके बाद से ही राजा ने अपने राज्य में यह त्योहार मनाने की घोषणा कर दी।

2.सूर्य पुत्र कर्ण ने अजेय योद्धा बनने के लिए की थी छठ पूजा

हिंदू मान्यता के मुताबिक, कथा प्रचलित है कि छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल से हुई थी।इस पर्व को सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके शुरू किया था।कहा जाता है कि कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों तक पानी में खड़े होकर उन्हें अर्घ्य देते थे।सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।

3.जुए मैं हारे राजपाठ को पुनः पाने के लिए द्रोपदी ने की थी छठ पूजा

छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस किवदंती के अनुसार, जब पांडव सारा राजपाठ जुए में हार गए,तब द्रोपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को सब कुछ वापस मिल गया।

लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

4.माता सीता ने भी की थी सूर्यदेव की पूजा

एक अन्य लोक कथा के अनुसार,जब राम-सीता 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थ, तब रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए  उन्होंने ऋषि-मुनियों के आज्ञा अनुसार सूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया।मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगाजल छिड़ककर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इससे सीता ने मुग्दल ऋषि के  आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।

5.एक अन्य लोक कथा

छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। हालाँकि अब यह पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि यह भारत के सूर्यवंशी राजाओं के मुख्य पर्वों से एक था। कहा जाता है कि एक समय मगध सम्राट जरासंध के एक पूर्वज का कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से निजात पाने हेतु राज्य के शाकलद्वीपीय मग ब्राह्मणों ने सूर्य देव की उपासना की थी। फलस्वरूप राजा के पूर्वज को कुष्ठ रोग से छुटकारा मिला और तभी से छठ पर सूर्योपासना की प्रातः आरंभ हुई है।

छठ व्रत पूर्ण नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। श्रद्धा भाव से किए गए इस व्रत इ नि:संतान को संतान सुख की प्राप्ति होती हैं और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। उपासक का जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है।

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