जानिए ऐसे समाज के बारे में जो हिरन के बच्चों को,अपने बच्चों के तरह दूध पिलाती हैं | Bishnoi Tribe in hindi

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जानिए ऐसे समाज के बारे में जो हिरन के बच्चों को,अपने बच्चों के तरह दूध पिलाती हैं | Bisnoi Tribe in hindi

 

Bishnoi Tribe in hindi

हमारा देश विभिन्न सभ्यता और  वाला देश है| हमारे देश मैं एक ऐसा समाज है जो हिरनों और वृक्षों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं। जी हाँ हम बात कर रहे हैं बिश्नोई समाज की जो की राजस्थान मैं निवास करता हैं।

बिनोई समाज क्या हैं

बिश्नोई समाज को ये नाम भगवान विष्णु से मिला। बिश्नोई समाज के लोग पर्यावरण की पूजा करते हैं। इस समाज के लोग ज्यादातर जंगल के आस -पास रहते हैं इनके बच्चे जानवरों के बच्चों के साथ खेलते हुए बड़े होते हैं। ये लोग हिंदू गुरु श्री जम्भेश्वर भगवान को मानते हैं। वे बीकानेर से थे।बिश्नोई समाज के लोग उनके बताए 29 नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं।

हिरन के बच्चों को अपने बच्चों की तरह पालते हैं

राजस्थान में करीब 500 सालों से बिश्नोई समाज के लोग जानवरों को अपने बच्चों की तरह पालते आए हैं। बिश्नोई समाज की महिलाएं न सिर्फ जानवरों को पालती हैं, बल्कि अपने बच्चे की तरह उनका देखभाल करती हैं। न सिर्फ महिलाएं बल्कि इस समाज के पुरुष भी लावारिस और अनाथ हो चुके हिरण के बच्चों को अपने घरों में परिवार की तरह पालते हैं। इस समाज की महिलाएं इन बच्चों को अपना दूध भी पित्लाती हैं |इस समाज की महिलाएं खुद को हिरण के इन बच्चों की मां कहलाना पसंद करती हैं।

पेड़ों को बचाने के लिए 336 बिश्नोई समाज के लोगों ने दी थी अपनी जान

 Bishnoi Tribe in hindi

ये घटना वर्ष 1736 के हैं उस समय जोधपुर से सटे खेजड़ली गांव में  में खेजड़ी की रक्षा के लिए बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। उस वक्त खेजड़ली व आसपास के गांव पेड़ों की हरियाली से भरे थे। दरबार के लोग खेजड़ली में खेजड़ी के पेड़ काटने पहुंचे।ग्रामीणों काे पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि पेड़ नहीं काटें, लेकिन वे नहीं माने। तब खेजड़ली कीअमृतादेवी बिश्नोई ने गुरु जम्भेश्वर महाराज की सौगंध दिलाई और पेड़ से चिपक गईं।तब एक योजनानुसार गाँव के लोग पेड़ों से चिपक गए। फिर संघर्ष में एक के बाद एक 363 लोग मारे गए।

भाई-बहन की तरह रहते हैं बच्चे
यहां रहने वाले 21 साल की रोशनी बिश्नोई कहती हैं कि ‘मैं हिरण के बच्चों के साथ ही बड़ी हुई हूं।’ वे मेरे भाई-बहन जैसे ही हैं। ये मेरी कर्तव्य हैं  कि उन्हें (हिरणों) को किसी तरह की परेशानी ना हो। वे मेरे छोटे भाई बहन की तरह हैं।  रोशनी बताती हैं कि ‘हम एक-दूसरे से बात करते हैं। वो हमारी भाषा अच्छी तरह से समझते हैं।’

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