नागालेंड की जाँन आँफ आर्क -रानी गाइदिनल्यु Biography of rani Gaidinliu

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Biography of rani Gaidinliu
Biography of rani Gaidinliu

नागालेंड की जाँन आँफ आर्क -रानी गाइदिनल्यु/Biography-of-Rani-Gaidinliu

  • जन्म –         26 जनवरी 1915
  • जन्म स्थान – लांगकाओ ग्राम रांगमई, मणिपुर
  • मृत्यु–          17 फरवरी 1937
  • शिक्षा –        मिशनरी स्कूल से शिक्षा पाने वाली पामेई टोली की प्रथम लड़की
  • योगदान–      नागालेंड ,मणिपुर व असम के उत्तरी भाग में अंग्रेजो के खिलाफ शशस्त्र छापामार युद्ध का नेत्रत्व किया 
  • उपलब्धि –     भारत सरकार दुवारा समाज सेवा के क्षेत्र में 1982 में पदमभूषण से सम्मानित किया गया

गाइदिनल्यु का प्रारंभिक जीवन

Biography of rani Gaidinliu.गाइदिनल्यु के पिता नागा लोगों के पुरोहित थेगाइदिनल्यु रांगमेई नामक आदिवासी समाज की पामेई नाम की टोली की लड़की थीवह बचपन से ही स्वतंत्र और स्वाभिमानी स्वभाव कि लड़की थी 

13 वर्ष कि आयु में वह अपने चचेरे भाई जादोनांग के संपर्क में आई, जो नागाओं के एक गुट का नेता थाजादोनांग अंग्रेजो को मणिपुर से बाहर निकालने के लिए प्रयत्नरत थाइससे पहले वह अपने आन्दोलन में सफल हो पाता। वह पकड़ा गया और 29 अगस्त 1931 में उसे फांसी पर चढ़ा दिया गया

नागा गुट का नेत्रत्व व अंग्रेजो के साथ संघर्ष 

जादोनांग के पश्चात नागा गुट का नेत्रत्व गाइदिनल्यु के हाथों में आ गयागाइदिनल्यु का मानना था कि वन सम्पति पर आदिवासी जातियों का परम्परागत रूप से पहला हक़ हैं लेकिन अंग्रेजो ने उनसे उनका हक छीन लिया था

गाइदिनल्यु ने अपने कुशल नेत्रत्व से 4000 नागाओं का एक छापामार दल का गठन कर , अंग्रेजों पर छापामार हमला करने लगी गाइदिनल्यु का दल हमला कर जंगलों में छिप जाता और अपना स्थान लगातार बदलता रहता जिस कारण अंग्रेज न तो उनका प्रतिकार कर पाते और न ही उन्हें पकड़ पातेअंग्रेज प्रशासन ने स्थानीय जनता पर बहुत अत्याचार किये, उन्हें प्रलोभन दिया पर लोगों ने उनके साथ विश्वास घात नहीं किया

उम्र कैद व् शारीरिक यातनाएं

अनेकों प्रयत्न असफल होने पर 17 अक्टूबर 1932 को रानी व उनके समर्थकों को पकड़ लिया गया गाइदिनल्यु को पकड़ कर इम्फाल लाया गयाउनकों और उनके साथियों को भयंकर यातनाएं दी गई , तथा उन पर मुकदमा चलाकर उम्र कैद की सजा सुनाई गई

1937 में प्रांतीय स्वशासन का अधिकार दिया गया तब प्रमुख नेताओं को कैद से छोड़ दिया गया थातब नेहरू जी ने गाइदिनल्यु को छुडवाने का प्रयास किया पर अंग्रेज सरकार गाइदिनल्यु से इतनी भयभीत थी कि वो उन्हें छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थीक्योकि जेल में बंद रहने पर भी गाइदिनल्यु पर इतना प्रभाव था कि उनके स्पर्श की गई एक बोतल पानी की कीमत उन दिनों 10 रूपये में बिकती थी क्योकि लोगों का ऐसा मानना था कि ये पानी अनेक रोगों में रामबाण औषिधि हैं

1947 में देश आजाद होने पर ही वे जेल से बाहर आ पाई और जीवन भर वे  लोगों के सामजिक , राजनीतिक ,आर्थिक उत्थान  में लगी रही सन 1991 में वे अपने जन्म स्थान लांगकाओ वापस आ गई जहाँ 17 फरवरी 1993 में उनका निधन हो गया

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