महर्षि बाल्मीकि का जीवन परिचय |Biography of Maharishi Valmiki in hindi

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Biography of Maharishi valmiki in hindi
Biography of Maharishi valmiki in hindi

 महर्षि बाल्मीकि का जीवन परिचय |Biography of Maharishi valmiki in hindi

महर्षि वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों कि श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त है। वह संस्कृत भाषा के आदि कवि और हिन्दुओं के आदि काव्य ‘रामायण’ के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं।

महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य ) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिए इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है।

उपनिषद के विवरण के अनुसार यह भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे।महर्षि वाल्मीकि का जन्म दिवस  की शरद पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।

महर्षि वाल्मीकि का नाम उनके कड़े तप के कारण पड़ा था। एक समय ध्यान में मग्न वाल्मीकि के शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपना घर बना लिया। जब वाल्मीकि जी की साधना पूरी हुई तो वो दीमकों के घर से बाहर निकले। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता हैं इसलिए ही महर्षि भी वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए 

मनुस्मृति के अनुसार प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि भी इन्हीं के भाई थे।

इस प्रकार लिखी महर्षि वाल्मीकि ने रामायण

रामायण लिखने के पीछे की कहानी 

रामायण के अनुसार, एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर गए। वहां उन्होंने प्रेम करते क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े को देखा।

तभी उन्होंने देखा कि एक निषाद (शिकारी) ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर महर्षि की करुणा जाग उठी और अनायास ही उनके मुख से ये शब्द निकले-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्॥

अर्थात- निषाद। तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।

नामक श्लोक फूट पड़ा और यही महाकाव्य रामायण का आधार बना।

डाकू रत्नाकर से महर्षि बाल्मीकि बनने की कथा  

एक पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि बाल्मीकि का पहले नाम रत्नाकर था  एक बार नारद मुनि एक जंगल से होकर गुजर रहे थे कि उनका सामना डाकू रत्नाकर से हो गया 

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नारद मुनि ने रत्नाकर से पूछा तुम ये लूटपाट क्यों करते हो ?

डाकू रत्नाकर ने कहा में ये कार्य अपने परिवार का पालन-पोषण के लिए करता हूँ |तब नारद मुनि ने कहा कि जिस परिवार के लिए तुम ये लूट पाट व् अत्याचार करते हो काया वे भी इन पापों का फल भोगने के लिए तैयार हैं | यह सुनकर रत्नाकर स्तब्ध रह गया 

उसने नारद मुनि से कहा कि में अपने परिवार से पूछकर बताऊंगा तब डाकू रत्नाकर नारद मुनि को एक पेड से बांधकर पूछने के लिए अपने घर चले गये 

घर पहुचने पर उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों से ये पूछा कि क्या वे लूटपाट में होने वाले पाप में उसके साझीदार हैं तो उन सभी ने मना कर दिया उन्होंने कहा कि जो पाप करता हैं वही पाप भोगने के लिए उत्तरदायी हैं | यह सुनकर रत्नाकर को बहुत दुःख हुआ 

वह वापस लौटकर नारद मुनि के पास पहुंचा और उनके पैरों में गिर गया , और रो रोकर उनसे सही ज्ञान देने की प्रार्थना करने लगा 

नारद मुनि ने उन्हें राम नाम जपने की सलाह दी यही डाकू रत्नाकर आगे चलकर महर्षि बाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए जिन्होंने रामायण की रचना की 

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