बौद्ध धर्म का इतिहास Bauddh Dharm history in hindi

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बौद्ध धर्म का इतिहास Bauddh Dharm history in hindi
बौद्ध धर्म का इतिहास Bauddh Dharm history in hindi

 Bauddh Dharm history in hindi.बौध धर्म की उत्पत्ति विश्व के दो प्रमुख धर्म इस्लाम और इसाई धर्मो से पूर्व हुई थी। इस धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को माना जाता हैं। एक समय में यह धर्म विश्व का सबसे बड़ा धर्म था, जो बाद में इसे धर्म और इस्लाम धर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण केवल कुछ देशों तक सीमित रह गया। 

अब इस धर्म के मानने वाले अनुयायी चीन,म्यांमार,थाईलेंड,कम्बोडिया,श्रीलंका,जापान,कोरिया, भूटान,नेपाल व भारत में रहते हैं। 

प्रारंभिक जीवन 

बौध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई0 पू0 में शाक्य कुल के क्षत्रिय राजा शुद्धोधन के यहाँ लुम्बनी में हुआ था। इनकी माता का नाम महामाया था। जिनका बचपन में ही देहांत हो गया था। इसलिए इनका पालन-पोषण इनकी मौसी गौतमी ने किया था। 

सिद्धार्थ बचपन से ही आध्यात्मिक विचार धारा के थे। इसीलिए इनका विवाह 16 वर्ष की आयु में यशोधरा से कर दिया गया था। 28 वे वर्ष इन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम राहुल रक्खा गया। इतना सब होने के बाद भी इनका मन सांसारिक कामों में नहीं लगता था। इस कारण इन्होने 29वर्ष की आयु में घर त्याग दिया। बौद्ध मत के अनुसार गृह त्याग की घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा गया। 

गृह त्याग और ज्ञान प्राप्ति 

गृह त्याग करने के बाद उनके प्रथम गुरु अलार और उद्रक थेलगातार 7 वर्ष भटकने के बाद 35 वर्ष की आयु में गया (बिहार ) में उर्वला नामक स्थान पर पीपल के वृक्ष के नीचे 49 वे दिन बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। जिसके बाद वे महात्मा बुद्ध कहलाये। इसके बाद उन्होंने वाराणसी के निकट सारनाथ में अपने पांच ब्राहमण शिष्यों को उपदेश दिए। ये उपदेश उन्होंने पाली भाषा में दिए और यह प्रथम उपदेश धर्मचक्रप्रवर्तन कहलाया। यही पर उन्होंने संघ की स्थापना की। 

इसके बाद महात्मा बुद्ध ने जगह-जगह भ्रमण कर उपदेश दिए। उन्होंने सर्वाधिक उपदेश श्रीवस्ती(कौशल)राज्य में दिए। उस समय के कई राजा उनके अनुयायी बन गए थे जैसे मगध नरेश बिम्बसार,कोशल नरेश प्रसेनजीत तथा कौशाम्बी नरेश उदयन। 

महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण (निधन) 80 वर्ष की आयु में 483 ई0 पू0 में कुशीनगर में हुआ। 

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दुखों के चार कारण -गौतम बुद्ध ने सांसारिक दुखों के चार कारण बताये

  1. जीवन दुःखमय। 
  2. दुःख का कारण हैं -तृष्णा,मोह ,लालसा। 
  3. इन कारणों को दूर करके दुखों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। 
  4. इसके लिए सत्य मार्ग का ज्ञान आवश्यक हैं। 

अष्टांगिक मार्ग-गौतम बुद्ध ने इन दुखों से छुटकारा पाने के लिए जो मार्ग बताया वो अष्टांगिक मार्ग कहलाता हैंजो इस प्रकार हैं –

  1. सम्यक भाषण
  2. सम्यक कर्म
  3. सम्यक प्रयत्न
  4. सम्यक भाव
  5. सम्यक ध्यान
  6. सम्यक संकल्प
  7. सम्यक द्रष्टि
  8. सम्यक निर्वाह

इसी के साथ गौतम बुद्ध ने मध्यम मार्ग (मध्यम प्रतिप्रदा ) अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा की न तो अधिक विलास करना चाहिए और न ही अधिक संयममहात्मा बुद्ध आत्मा और ईश्वर में विश्वास नहीं रखते थे। बौद्ध धर्म के दरवाजे सभी वर्गों के लिए खुले हुए थे। इन्होने  वर्ण व्यवस्था का पूर्ण विरोध किया तथा प्रचार व प्रसार के लिए लोक व्यवाहर की भाषा पाली का सहयोग लिया। 

बौद्ध धर्म के अंग 

बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख अंग हैं –बुद्ध, संघ और धर्म। संघ में वे सभी स्त्री /पुरुष शामिल हो सकते थे जिनकी आयु 15वर्ष की हो चुकी हो और जो रोग ग्रस्त,अपंग,कर्जदार और दास न हो। 

बौद्ध धर्म के प्रतीक 

महात्मा बुद्ध के जीवन में घटित होने वाली पांच घटनाएँ बौद्ध धर्म की प्रतीक मानी जाती हैं। 

  1. जन्म (कमल व् सांड)
  2. गृह त्याग (अश्व )
  3. महाबोधि (बोधि वृक्ष )
  4. प्रथम उपदेश (धरम चक्र प्रवर्तन)
  5. निर्वाण (पद चिन्ह )

बौद्ध धर्म के अनुसार जीवन का चरम लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना हैंमहात्मा बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए सदाचार और नैतिकता पर आधारित 10 शीलों पर जोर दिया हैं – 1.अहिंसा 2.सत्य 3.अस्तेय(चोरी न करना) 4.व्याभिचार न करना 5.मद्य का सेवन न करना 6.असमय भोजन न करना 7.सुखप्रद बिस्तर पर सोना 8.धन संचय करना 9.स्त्रियों का संसर्ग करना

बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण तो इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है, लेकिन महापरिनिर्वाण मृत्यु के बाद ही संभव हैं

बौद्ध धर्म के सिद्धांत 

बौद्ध धर्म के सिद्धांतो को त्रिपिटक में संकलित किया गया हैं। जिसके तीन भाग है। 

  1. सुत्त पिटक– बुद्ध के धार्मिक उपदेशों का संग्रह ।  इसके पांच अंग हैं 1.दीग्घ निकाय 2. मज्झिम निकाय 3.संयुक्त निकाय 4.अंगुत्तर निकाय 5. खुद्दक निकाय
  2. विनय पिटक– इसमें बौद्ध संघ के नियमों का वर्णन हैं। 
  3. अभिधम्म पिटक– इसको तृतीय बौद्ध संगीत जो की अशोक के समय में पाटलिपुत्र में आयोजित हुई थी उसमे इसे लिपिबद्ध किया गया था। 

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