पर हित सरिस धर्म नहि भाई

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               एक बार एक राजा ने अपने मंत्री से किसी विद्वयान पंडित को बुलाने के लिए कहा , जो उन्हें सभी धर्मो का सार समझा सके। मंत्री के आदेश पर दरबार में अनेकों पंडित अपने -अपने धर्मग्रंथ लेकर उपस्थित हो गए।

               राजा ने मंत्री से कहा – ” इतने सारे धर्मग्रंथो को सुनने में संभवतया वर्ष निकल जाये। आप विद्वजनों से कहें कि ये धर्मग्रंथो का सार -निष्कर्ष  बता दे तो बड़ी कृपा होगी। “

               मंत्री ने राजा का मंतव्य पंडितों के सामने रख दिया। लंबा उद्बोधन देना तो आसान था , परंतु सार निष्कर्ष बताना कठिन था।  अंततः एक ज्ञानी पंडित आगे आये और राजा को समझाते हुए बोले – ” महाराज ! सभी धर्मग्रंथो का सार यही हैं कि हम दूसरों पर  उपकार करे। उन्हें पीड़ा न दें और उनके कष्टो का निवारण करें। 

इसलिए गोस्वामी तुलसीदास ने धर्म की परिभाषा देते हुए कहा हैं –‘ पर हित सरिस धर्म नहि भाई ‘

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